दर्द जब से हुआ है अम्बर सा
दिल हमारा हुआ सुमन्दर सा
मेरे माथे पे जल रहा दीया
जैसे हो मयकदे में मन्दिर सा
तीर आँखो पे सब के लगते है
कौन जीता है पर स्वयंबर सा
कह रहा है मुझे वो आइने से
अब तूँ लगता नहीं सिकंदर सा
तूँ कहाँ ढूँढने मुझे निकला
मैं नहीं हूँ किसी आडम्बर सा
बंद दरवाज़े घर के कहते हैं
ना तूँ बाहर सा ना तूँ अंदर सा
जिंदगी अब के साल यूँ गुजरी
हादसों से भरा कैलन्डर सा
Friday, July 31, 2009
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