Friday, July 31, 2009

दर्द जब से

दर्द जब से हुआ है अम्बर सा
दिल हमारा हुआ सुमन्दर सा

मेरे माथे पे जल रहा दीया
जैसे हो मयकदे में मन्दिर सा

तीर आँखो पे सब के लगते है
कौन जीता है पर स्वयंबर सा

कह रहा है मुझे वो आइने से
अब तूँ लगता नहीं सिकंदर सा

तूँ कहाँ ढूँढने मुझे निकला
मैं नहीं हूँ किसी आडम्बर सा

बंद दरवाज़े घर के कहते हैं
ना तूँ बाहर सा ना तूँ अंदर सा

जिंदगी अब के साल यूँ गुजरी
हादसों से भरा कैलन्डर सा