Friday, July 31, 2009

दर्द जब से

दर्द जब से हुआ है अम्बर सा
दिल हमारा हुआ सुमन्दर सा

मेरे माथे पे जल रहा दीया
जैसे हो मयकदे में मन्दिर सा

तीर आँखो पे सब के लगते है
कौन जीता है पर स्वयंबर सा

कह रहा है मुझे वो आइने से
अब तूँ लगता नहीं सिकंदर सा

तूँ कहाँ ढूँढने मुझे निकला
मैं नहीं हूँ किसी आडम्बर सा

बंद दरवाज़े घर के कहते हैं
ना तूँ बाहर सा ना तूँ अंदर सा

जिंदगी अब के साल यूँ गुजरी
हादसों से भरा कैलन्डर सा

Saturday, May 9, 2009

ना कवि ना ग़ज़लगो

मैं ना कोई कवि हूँ
ना ग़ज़लगो
आप ने कुश शब्द सिखाऐ
फिर उनके अर्थ समझाए
मैं उन तन्हां शब्दों को
अपने पास बुलाता हूँ
उनको एक दूसरे के
करीब लाता हूँ ...

शब्द जमाह शब्द
मुझको मिलते हैं
नए अर्थ
इन अर्थो से खुशबू
मुझे आती है
जो मुझे मेरे करीब लाती है ...

मैं ना कोई कवि हूँ
ना ग़ज़लगो
मैं तो शब्दों को
उनकी सीमत
कैद से मुक्त करता हूं
वक्त के पन्नों पर
पलों शिंनो के रंग
भरता हूं ...

मैं तो बस
काफीऐ से काफीया
मेंलता हूँ
मैं तो बस शब्दों से
खेलता हूँ ...

Saturday, April 25, 2009

महखाना और सिर

वो महखाने में आया

अपना सिर मेज़ पे रखा

सेवादार को हुकुम दिया

फिर गलास्सी उठाई

एक पैग

दो पैग

तीन

फिर पता नही कितने

जब उसको लगा

के उसका सीना अब पुरजोर है

तो उसने मेज़ पर

इधर उधर हाथ मारा

और मेज़ पर पड़ा

किसी और का सिर

उठाकर

अपने घर लौट गया