Saturday, May 9, 2009

ना कवि ना ग़ज़लगो

मैं ना कोई कवि हूँ
ना ग़ज़लगो
आप ने कुश शब्द सिखाऐ
फिर उनके अर्थ समझाए
मैं उन तन्हां शब्दों को
अपने पास बुलाता हूँ
उनको एक दूसरे के
करीब लाता हूँ ...

शब्द जमाह शब्द
मुझको मिलते हैं
नए अर्थ
इन अर्थो से खुशबू
मुझे आती है
जो मुझे मेरे करीब लाती है ...

मैं ना कोई कवि हूँ
ना ग़ज़लगो
मैं तो शब्दों को
उनकी सीमत
कैद से मुक्त करता हूं
वक्त के पन्नों पर
पलों शिंनो के रंग
भरता हूं ...

मैं तो बस
काफीऐ से काफीया
मेंलता हूँ
मैं तो बस शब्दों से
खेलता हूँ ...

1 comment:

  1. मैं ना कोई कवि हूँ
    ना ग़ज़लगो
    आप ने कुश शब्द सिखाऐ
    फिर उनके अर्थ समझाए
    मैं उन तन्हां शब्दों को
    अपने पास बुलाता हूँ
    उनको एक दूसरे के
    करीब लाता हूँ ...

    बहुत खूब ....!! जसवीर जी हमें आपकी और भी रचनाओं का इन्तजार रहेगा ....!!

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